
अधूरा प्यार
मैं, रूबी, सत्रह साल की, आज कुछ अलग महसूस कर रही हूँ। शायद इसलिए कि आज मैं अभिनव से मिली थी। अभिनव, मेरे पति। हाँ, तुम सही सुन रही हो। अठाईस साल का एक मर्द, मेरा पति। हमारी शादी को एक महीना भी नहीं हुआ है, पर ऐसा लगता है जैसे सदियाँ गुज़र गई हों। हमारा घर, जो कि अब मेरा भी है, शिमला की वादियों में बसा एक छोटा सा कॉटेज है। चारों तरफ देवदार के पेड़ हैं, और सुबह-सुबह चिड़ियों की चहचहाहट से नींद खुलती है। ये जगह खूबसूर...
Story context
Character introduction

Ruby
Role: main character
Chapter samples
1Chapter 1▾
मैं, रूबी, सत्रह साल की, आज कुछ अलग महसूस कर रही हूँ। शायद इसलिए कि आज मैं अभिनव से मिली थी। अभिनव, मेरे पति। हाँ, तुम सही सुन रही हो। अठाईस साल का एक मर्द, मेरा पति। हमारी शादी को एक महीना भी नहीं हुआ है, पर ऐसा लगता है जैसे सदियाँ गुज़र गई हों। हमारा घर, जो कि अब मेरा भी है, शिमला की वादियों में बसा एक छोटा सा कॉटेज है। चारों तरफ देवद...
मैं, रूबी, सत्रह साल की, आज कुछ अलग महसूस कर रही हूँ। शायद इसलिए कि आज मैं अभिनव से मिली थी। अभिनव, मेरे पति। हाँ, तुम सही सुन रही हो। अठाईस साल का एक मर्द, मेरा पति। हमारी शादी को एक महीना भी नहीं हुआ है, पर ऐसा लगता है जैसे सदियाँ गुज़र गई हों। हमारा घर, जो कि अब मेरा भी है, शिमला की वादियों में बसा एक छोटा सा कॉटेज है। चारों तरफ देवदार के पेड़ हैं, और सुबह-सुबह चिड़ियों की चहचहाहट से नींद खुलती है। ये जगह खूबसूरत है, शांत है, पर मेरे दिल में एक अजीब सी बेचैनी है। अभिनव बहुत अच्छे हैं। वो मेरी हर ज़रूरत का ख्याल रखते हैं, मुझसे प्यार से बात करते हैं, और मुझे कभी किसी चीज़ की कमी महसूस नहीं होने देते। फिर भी, उनके छूने में वो आग नहीं है, वो कसक नहीं है, जो एक सत्रह साल की लड़की अपने पति से उम्मीद करती है। आज सुबह जब मैं नाश्ता बना रही थी, तो अभिनव ने पीछे से आकर मुझे गले लगा लिया। "रूबी, आज मौसम कितना सुहाना है, क्यों न हम आज घूमने चलें?" उन्होंने मेरे बालों में किस करते हुए कहा। मैंने हाँ में सर हिला दिया, पर मेरे अंदर एक अजीब सी कशमकश चल रही थी। क्या मैं सिर्फ इसलिए शादी के बंधन में बंध गई क्योंकि मेरे परिवार ने चाहा था? क्या मैं कभी अभिनव को उस तरह प्यार कर पाऊँगी जैसा वो मुझे करते हैं? ये सवाल मेरे दिमाग में घूमते रहते हैं, और मुझे कोई जवाब नहीं मिलता। शाम को हम घूमने निकले। शिमला की वादियों में, पहाड़ों की ऊँचाई पर, मैंने अभिनव का हाथ थामा। उनकी आँखें मुझसे कुछ कहना चाहती थीं, पर वो हमेशा खामोश रह जाते हैं। अचानक, उन्होंने मुझे एक खूबसूरत लाल गुलाब दिया। "रूबी, ये तुम्हारे लिए," उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा। मैंने गुलाब ले लिया, पर मेरे दिल में फिर वही सवाल उठने लगे। क्या सिर्फ गुलाब देने से प्यार हो जाता है? क्या सिर्फ साथ रहने से रिश्ता बन जाता है? तभी, अभिनव ने मुझसे पूछा, "रूबी, क्या तुम खुश हो?" उनकी आँखों में एक अजीब सी उम्मीद थी, जैसे वो मेरे जवाब का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हों। मैं क्या कहूँ? क्या मैं उन्हें सच बता दूँ कि मैं खुश नहीं हूँ, या मैं झूठ बोलकर उन्हें खुश कर दूँ? उनकी मासूमियत को देखकर, क्या मैं सच बोलने की हिम्मत कर पाऊँगी या अपनी भावनाओं को छुपाकर इस रिश्ते को निभाती रहूँगी?
2Chapter 2▾
मैं गुलाब को अपनी उंगलियों से सहलाती हूँ। इसकी पंखुड़ियाँ मख़मली हैं, गहरा लाल रंग मेरे गालों की लाली से मेल खाता है। अभिनव की आँखों में झाँकती हूँ, उनमें एक सवाल है, एक डर है। "मुझे थोड़ा समय चाहिए, अभिनव।" मेरे शब्द हवा में तैर जाते हैं, एक हल्की सी साँस की तरह। अभिनव की मुस्कान थोड़ी फीकी पड़ जाती है, लेकिन वो कुछ नहीं कहते। वो मेरी ब...
मैं गुलाब को अपनी उंगलियों से सहलाती हूँ। इसकी पंखुड़ियाँ मख़मली हैं, गहरा लाल रंग मेरे गालों की लाली से मेल खाता है। अभिनव की आँखों में झाँकती हूँ, उनमें एक सवाल है, एक डर है। "मुझे थोड़ा समय चाहिए, अभिनव।" मेरे शब्द हवा में तैर जाते हैं, एक हल्की सी साँस की तरह। अभिनव की मुस्कान थोड़ी फीकी पड़ जाती है, लेकिन वो कुछ नहीं कहते। वो मेरी बात समझते हैं, या शायद समझने की कोशिश कर रहे हैं। हम दोनों कुछ देर तक चुपचाप खड़े रहते हैं, शिमला की वादियों में, जहाँ हवा में देवदार के पेड़ों की खुशबू घुली हुई है। सूरज डूबने लगा है, और आसमान में नारंगी और गुलाबी रंग फैल रहे हैं। "समय किस लिए, रूबी?" आखिरकार अभिनव पूछते हैं। उनकी आवाज़ धीमी है, जैसे वो कोई नाज़ुक चीज़ छूने से डर रहे हों। मैं जवाब नहीं दे पाती। समय किस लिए? ये तो मैं भी नहीं जानती। शायद खुद को समझने के लिए, शायद इस रिश्ते को समझने के लिए, शायद ये जानने के लिए कि मैं सच में क्या चाहती हूँ। "मुझे नहीं पता," मैं कहती हूँ, मेरी आवाज़ काँपती है। "मुझे बस थोड़ा समय चाहिए।" अभिनव मेरा हाथ थाम लेते हैं। उनका स्पर्श गर्म है, लेकिन आज मुझे इसमें वो सुकून नहीं मिलता जो पहले मिलता था। "ठीक है, रूबी। मैं तुम्हें समय दूँगा। जितना तुम्हें चाहिए।" हम वापस कॉटेज की ओर चलते हैं। रास्ते में, मैं सोचती हूँ कि अभिनव कितने अच्छे हैं। वो हमेशा मेरा ख्याल रखते हैं, मेरी भावनाओं को समझने की कोशिश करते हैं। शायद मैं ही हूँ जो उनके प्यार को नहीं समझ पा रही हूँ। घर पहुँचकर, मैं सीधे अपने कमरे में चली जाती हूँ। मैं बिस्तर पर बैठ जाती हूँ, और लाल गुलाब को अपनी छाती से लगा लेती हूँ। इसकी खुशबू मुझे मदहोश कर रही है, लेकिन मेरे दिल में अभी भी वही बेचैनी है। क्या मैं कभी अभिनव को प्यार कर पाऊँगी? क्या मैं कभी इस रिश्ते में खुश रह पाऊँगी? ये सवाल मेरे दिमाग में घूमते रहते हैं, और मुझे कोई जवाब नहीं मिलता। मैं अपनी आँखें बंद कर लेती हूँ, और गहरी साँस लेती हूँ। मुझे नहीं पता कि कल क्या होगा, लेकिन मैं जानती हूँ कि मुझे अपने दिल की सुननी होगी।
3Chapter 3▾
बाहर, हल्की बारिश शुरू हो जाती है, जो देवदार के पेड़ों को और भी गहरा हरा कर देती है। बारिश की बूँदें खिड़की से टकराती हैं, एक धीमी लय में, जैसे कोई दर्द भरा गीत गा रही हों। मैं कमरे में बैठी हूँ, गुलाब को अपनी गोद में रखे हुए। उसकी खुशबू अब भी ताज़ा है, लेकिन मेरे दिल की उदासी कम नहीं हो रही है। अभिनव लिविंग रूम में हैं, शायद किताब पढ़ र...
बाहर, हल्की बारिश शुरू हो जाती है, जो देवदार के पेड़ों को और भी गहरा हरा कर देती है। बारिश की बूँदें खिड़की से टकराती हैं, एक धीमी लय में, जैसे कोई दर्द भरा गीत गा रही हों। मैं कमरे में बैठी हूँ, गुलाब को अपनी गोद में रखे हुए। उसकी खुशबू अब भी ताज़ा है, लेकिन मेरे दिल की उदासी कम नहीं हो रही है। अभिनव लिविंग रूम में हैं, शायद किताब पढ़ रहे हैं या टीवी देख रहे हैं। मैं नहीं जानती। मैं उनसे बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही हूँ। मुझे डर लग रहा है कि मैं उन्हें क्या कहूँगी। क्या मैं उन्हें बताऊँगी कि मैं कितनी उलझन में हूँ? क्या मैं उन्हें बताऊँगी कि मुझे नहीं पता कि मैं उनसे प्यार करती हूँ या नहीं? मैं उठती हूँ और खिड़की के पास जाती हूँ। बाहर का नज़ारा धुंधला है, बारिश की वजह से। पेड़ और पहाड़ सब एक जैसे लग रहे हैं, जैसे सब कुछ एक ही रंग में रंगा हो। मैं सोचती हूँ कि क्या मेरी जिंदगी भी ऐसी ही हो गई है, धुंधली और बेरंग। तभी अभिनव कमरे में आते हैं। वो मुझे खिड़की के पास खड़ा देखकर रुक जाते हैं। उनकी आँखों में चिंता है, लेकिन वो कुछ नहीं कहते। वो बस मुझे देखते रहते हैं। "रूबी," वो आखिरकार कहते हैं, उनकी आवाज़ धीमी है। "क्या तुम ठीक हो?" मैं उनकी ओर देखती हूँ। मैं जानती हूँ कि मुझे उनसे सच बोलना चाहिए, लेकिन मैं डरती हूँ। मैं डरती हूँ कि मैं उन्हें चोट पहुँचाऊँगी। "मैं... मैं ठीक नहीं हूँ," मैं कहती हूँ, मेरी आवाज़ काँपती है। "मुझे नहीं पता कि मैं क्या करूँ।" अभिनव मेरे पास आते हैं और मेरा हाथ थाम लेते हैं। उनका स्पर्श अब भी गर्म है, लेकिन आज मुझे इसमें वो सहारा नहीं मिलता जो पहले मिलता था। "क्या हुआ, रूबी?" वो पूछते हैं। "तुम मुझे बता सकती हो।" मैं गहरी साँस लेती हूँ और उन्हें सब कुछ बता देती हूँ। मैं उन्हें बताती हूँ कि मैं कितनी उलझन में हूँ, कि मुझे नहीं पता कि मैं उनसे प्यार करती हूँ या नहीं, कि मुझे डर लग रहा है कि मैं उन्हें कभी खुश नहीं कर पाऊँगी। अभिनव चुपचाप मेरी बात सुनते हैं। जब मैं खत्म करती हूँ, तो वो कुछ देर तक कुछ नहीं कहते। फिर वो धीरे से मुस्कुराते हैं। "रूबी," वो कहते हैं, "मैं तुम्हें समझता हूँ। ये आसान नहीं है, ये मैं जानता हूँ। लेकिन मैं तुमसे प्यार करता हूँ, और मैं तुम्हारे साथ हूँ, चाहे कुछ भी हो।" उनकी बातों से मुझे थोड़ी राहत मिलती है, लेकिन मेरे दिल की बेचैनी अभी भी बनी रहती है। मैं जानती हूँ कि मुझे अभी भी बहुत कुछ सोचना है, बहुत कुछ समझना है। लेकिन मैं ये भी जानती हूँ कि मैं अकेली नहीं हूँ। अभिनव मेरे साथ हैं, और वो हमेशा मेरे साथ रहेंगे। मैं अभिनव के गले लगती हूँ, और वो मुझे कसकर पकड़ लेते हैं। उनकी बाहों में, मुझे थोड़ी देर के लिए सुकून मिलता है। मैं अपनी आँखें बंद कर लेती हूँ, और बारिश की आवाज़ सुनती हूँ। शायद, सब कुछ ठीक हो जाएगा।




